गुरुवार, 16 जून 2016

भूमिका / अभ्यास से पहले

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    भूमिका

    योगासन के सैकड़ों प्रकार हैं- कुछ सरल, कुछ कठिन, कुछ बहुत कठिन। इसी प्रकार, प्राणायम भी बहुत तरह के होते हैं और ध्यान की भी अनेकों विधियाँ हैं।
    यहाँ कुछ सामान्य योगासनों, एक सरल प्राणायाम और ध्यान की एक सहज विधि का चयन कर उन्हें एक शृँखला के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसे लगभग बीस मिनट में पूरा किया जा सकता है।
    इस शृँखला को विशेषकर किशोरों एवं युवाओं की उस पीढ़ी के लिए तैयार किया गया है, जो समय की कमी का बहाना बनाकर स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बरतते हैं। वैसे, किसी भी उम्र के व्यक्ति इसका अभ्यास कर सकते हैं- आवश्यकतानुसार, थोड़ी सावधानी के साथ। 
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    योगासनों का चयन करते समय मुख्य रुप से इस बात को ध्यान में रखा गया है कि एक आसन में अगर हम सामने की ओर झुकें, तो अगले आसन में हमें पीछे की ओर झुकना पड़े। उद्देश्य है- मेरुदण्ड की लोच, यानि रीढ़ की हड्डी की लचक को बनाये रखना। इस लचक के बने रहने से हम न केवल शारीरिक रुप से स्वस्थ रहते हैं, बल्कि मानसिक रुप से भी प्रसन्नचित्त रहते हैं- ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। मेरी जानकारी के अनुसार, हाल के वर्षों में वैज्ञानिक शोधों में भी ऐसा ही कुछ साबित हो चुका है।
    प्राणायाम के रुप में अनुलोम-विलोम का चयन किया गया है- हालाँकि एक वैकल्पिक विधि का भी जिक्र है। इसके चयन का उद्देश्य है- फेफड़ों के पूरे आयतन में ऑक्सीजन की आपूर्ति। ऑक्सीजन ही है, जो हमारे रक्त में घुलकर सारे शरीर में दौड़ता है और हमें नयी ऊर्जा देता है। आम तौर पर हम जिस तरह से साँस लेते हैं, उससे फेफड़ों के पूरे आयतन में ऑक्सीजन की आपूर्ति नहीं होती है।
    ध्यान के लिए एक सहज विधि का का चयन किया गया है, जिसका उद्देश्य है- मन की एकाग्रता को बढ़ाना। मन की एकाग्रता हमारा मनोबल बढ़ाती है। मनोबल और आध्यात्मिक शक्ति में कोई अन्तर हो भी सकता है, मगर मेरे लिए दोनों समान हैं।
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    कुल-मिलाकर,
    1.    मेरुदण्ड की लोच को बनाये रखकर;
    2.    फेफड़ों में ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति करके, और
    3.    मन की एकाग्रता को बढ़ाकर
शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता तथा मनोबल या आध्यात्मिक उन्नति को पाने की एक छोटी-सी कोशिश का नाम "जय-योग" है। छोटी-सी कोशिश इसलिए कि प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद और जलपान से पहले सिर्फ 20 मिनट समय निकालकर हम इस अभ्यास को कर सकते हैं।
                                                                                                    -जयदीप शेखर

21 जून 2016, ‘योग दिवस’
बरहरवा

पुनश्चः

हालाँकि eBook के रुप में तथा "जय-योग" के नाम से इस शृँखला को 2016 के इस ‘योग दिवस’ के दिन प्रस्तुत किया जा रहा है, मगर वास्तव में, इस शृँखला को मैंने वर्ष 2010 में तैयार किया था और अपने एक ब्लॉग (‘बीस मिनट की योग शृँखला’) पर प्रस्तुत भी किया था। उस समय मेरे तेरह-वर्षीय किशोर बेटे अभिमन्यु ने (योग करते हुए) मेरी इन तस्वीरों को खींचा था।
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अभ्यास से पहले

     
    योगासन और कसरत में अन्तर होता है। कसरत करने के बाद स्नान की जरुरत पड़ती है, जबकि योगासन स्नान के बाद ही किया जाता है। (‘उपसंहार’ में मैंने कसरत पर भी कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं।)
इस शृँखला के अभ्यास के लिए सुबह के स्नान तथा नाश्ते के बीच हमें 20 मिनट का समय निकालना पड़ेगा। योगासन का अभ्यास जमीन पर दरी, कालीन या कम्बल बिछाकर किया जाता है।
पूरी शृँखला का अभ्यास करने में हमें लगभग 20 मिनट का समय लगेगा- अर्थात् प्रति आसन एक मिनट। घड़ी देखने की जरूरत नहीं, मन में 100 तक की गिनती को हम एक मिनट मान सकते हैं।
    एक आसन की मुद्रा में 100 की गिनती तक रुकना मुश्किल लगने पर 30-30 की गिनती तक रुकते हुए एक आसन को तीन बार किया जा सकता है।
     जिन किशोर/युवाओं ने पहले कभी योगाभ्यास या कसरत नहीं किया है और जो खेल-कूद से भी दूर रहे हैं, उनके लिए दो सलाह हैंः
1. उन्हें महीने भर तक अधिकतम 30 गिनने तक ही एक आसन की मुद्रा में रहना चाहिए। उसके बाद धीरे-धीरे समय बढ़ाते हुए सौ की गिनती तक आना चाहिए।
2. उन्हें शुरु के दो-तीन महीनों तक ‘चक्रासन’ और ‘सर्वांगासन’ को छोड़कर इस शृँखला का अभ्यास करना चाहिए। दो-तीन महीनों के बाद चक्रासन के स्थान पर ‘अर्द्ध-चक्रासन’ और सर्वांगासन के स्थान पर ‘विपरीतकरणी मुद्रा’ का अभ्यास करना चाहिए। अर्थात्, चार-छह महीनों के बाद ही चक्रासन और सर्वांगासन करने की कोशिश करनी चाहिए, वह भी पूरी सावधानी के साथ।
योगाभ्यास/कसरत/खेल-कूद से दूर रहे ऐसे व्यक्ति, जिनकी उम्र 25-30 वर्ष से ज्यादा है, अगर चक्रासन और सर्वांगासन न ही करें, तो बेहतर- उन्हें अर्द्ध-चक्रासन और विपरीतकरणी मुद्रा से सन्तोष करना चाहिए।
      अभ्यास के दौरान साँस की गति को सामान्य रखना है- सिवाय पर्वतासन और प्राणायाम के।
    अभ्यास अगर खुली हवा में किया जा सके, तो उत्तम, अन्यथा जिस कमरे में ताजी हवा आती हो, वहाँ अभ्यास किया जा सकता है।
    तो आईए, शुरु करते हैं- ”जय-योग“, अर्थात् 20 मिनट की योग-शृँखला।

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