गुरुवार, 16 जून 2016

भूमिका / अभ्यास से पहले

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    भूमिका

    योगासन के सैकड़ों प्रकार हैं- कुछ सरल, कुछ कठिन, कुछ बहुत कठिन। इसी प्रकार, प्राणायम भी बहुत तरह के होते हैं और ध्यान की भी अनेकों विधियाँ हैं।
    यहाँ कुछ सामान्य योगासनों, एक सरल प्राणायाम और ध्यान की एक सहज विधि का चयन कर उन्हें एक शृँखला के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसे लगभग बीस मिनट में पूरा किया जा सकता है।
    इस शृँखला को विशेषकर किशोरों एवं युवाओं की उस पीढ़ी के लिए तैयार किया गया है, जो समय की कमी का बहाना बनाकर स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बरतते हैं। वैसे, किसी भी उम्र के व्यक्ति इसका अभ्यास कर सकते हैं- आवश्यकतानुसार, थोड़ी सावधानी के साथ। 
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    योगासनों का चयन करते समय मुख्य रुप से इस बात को ध्यान में रखा गया है कि एक आसन में अगर हम सामने की ओर झुकें, तो अगले आसन में हमें पीछे की ओर झुकना पड़े। उद्देश्य है- मेरुदण्ड की लोच, यानि रीढ़ की हड्डी की लचक को बनाये रखना। इस लचक के बने रहने से हम न केवल शारीरिक रुप से स्वस्थ रहते हैं, बल्कि मानसिक रुप से भी प्रसन्नचित्त रहते हैं- ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। मेरी जानकारी के अनुसार, हाल के वर्षों में वैज्ञानिक शोधों में भी ऐसा ही कुछ साबित हो चुका है।
    प्राणायाम के रुप में अनुलोम-विलोम का चयन किया गया है- हालाँकि एक वैकल्पिक विधि का भी जिक्र है। इसके चयन का उद्देश्य है- फेफड़ों के पूरे आयतन में ऑक्सीजन की आपूर्ति। ऑक्सीजन ही है, जो हमारे रक्त में घुलकर सारे शरीर में दौड़ता है और हमें नयी ऊर्जा देता है। आम तौर पर हम जिस तरह से साँस लेते हैं, उससे फेफड़ों के पूरे आयतन में ऑक्सीजन की आपूर्ति नहीं होती है।
    ध्यान के लिए एक सहज विधि का का चयन किया गया है, जिसका उद्देश्य है- मन की एकाग्रता को बढ़ाना। मन की एकाग्रता हमारा मनोबल बढ़ाती है। मनोबल और आध्यात्मिक शक्ति में कोई अन्तर हो भी सकता है, मगर मेरे लिए दोनों समान हैं।
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    कुल-मिलाकर,
    1.    मेरुदण्ड की लोच को बनाये रखकर;
    2.    फेफड़ों में ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति करके, और
    3.    मन की एकाग्रता को बढ़ाकर
शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता तथा मनोबल या आध्यात्मिक उन्नति को पाने की एक छोटी-सी कोशिश का नाम "जय-योग" है। छोटी-सी कोशिश इसलिए कि प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद और जलपान से पहले सिर्फ 20 मिनट समय निकालकर हम इस अभ्यास को कर सकते हैं।
                                                                                                    -जयदीप शेखर

21 जून 2016, ‘योग दिवस’
बरहरवा

पुनश्चः

हालाँकि eBook के रुप में तथा "जय-योग" के नाम से इस शृँखला को 2016 के इस ‘योग दिवस’ के दिन प्रस्तुत किया जा रहा है, मगर वास्तव में, इस शृँखला को मैंने वर्ष 2010 में तैयार किया था और अपने एक ब्लॉग (‘बीस मिनट की योग शृँखला’) पर प्रस्तुत भी किया था। उस समय मेरे तेरह-वर्षीय किशोर बेटे अभिमन्यु ने (योग करते हुए) मेरी इन तस्वीरों को खींचा था।
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अभ्यास से पहले

     
    योगासन और कसरत में अन्तर होता है। कसरत करने के बाद स्नान की जरुरत पड़ती है, जबकि योगासन स्नान के बाद ही किया जाता है। (‘उपसंहार’ में मैंने कसरत पर भी कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं।)
इस शृँखला के अभ्यास के लिए सुबह के स्नान तथा नाश्ते के बीच हमें 20 मिनट का समय निकालना पड़ेगा। योगासन का अभ्यास जमीन पर दरी, कालीन या कम्बल बिछाकर किया जाता है।
पूरी शृँखला का अभ्यास करने में हमें लगभग 20 मिनट का समय लगेगा- अर्थात् प्रति आसन एक मिनट। घड़ी देखने की जरूरत नहीं, मन में 100 तक की गिनती को हम एक मिनट मान सकते हैं।
    एक आसन की मुद्रा में 100 की गिनती तक रुकना मुश्किल लगने पर 30-30 की गिनती तक रुकते हुए एक आसन को तीन बार किया जा सकता है।
     जिन किशोर/युवाओं ने पहले कभी योगाभ्यास या कसरत नहीं किया है और जो खेल-कूद से भी दूर रहे हैं, उनके लिए दो सलाह हैंः
1. उन्हें महीने भर तक अधिकतम 30 गिनने तक ही एक आसन की मुद्रा में रहना चाहिए। उसके बाद धीरे-धीरे समय बढ़ाते हुए सौ की गिनती तक आना चाहिए।
2. उन्हें शुरु के दो-तीन महीनों तक ‘चक्रासन’ और ‘सर्वांगासन’ को छोड़कर इस शृँखला का अभ्यास करना चाहिए। दो-तीन महीनों के बाद चक्रासन के स्थान पर ‘अर्द्ध-चक्रासन’ और सर्वांगासन के स्थान पर ‘विपरीतकरणी मुद्रा’ का अभ्यास करना चाहिए। अर्थात्, चार-छह महीनों के बाद ही चक्रासन और सर्वांगासन करने की कोशिश करनी चाहिए, वह भी पूरी सावधानी के साथ।
योगाभ्यास/कसरत/खेल-कूद से दूर रहे ऐसे व्यक्ति, जिनकी उम्र 25-30 वर्ष से ज्यादा है, अगर चक्रासन और सर्वांगासन न ही करें, तो बेहतर- उन्हें अर्द्ध-चक्रासन और विपरीतकरणी मुद्रा से सन्तोष करना चाहिए।
      अभ्यास के दौरान साँस की गति को सामान्य रखना है- सिवाय पर्वतासन और प्राणायाम के।
    अभ्यास अगर खुली हवा में किया जा सके, तो उत्तम, अन्यथा जिस कमरे में ताजी हवा आती हो, वहाँ अभ्यास किया जा सकता है।
    तो आईए, शुरु करते हैं- ”जय-योग“, अर्थात् 20 मिनट की योग-शृँखला।

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

वज्रासन

 
वज्रासन सबसे सरल आसन होता है। बस पैरों को घुटनों से मोड़कर बैठना है। पैरों के अँगूठे एक-दूसरे के ऊपर रहेंगे, एड़ियों को बाहर की ओर फैलाकर बैठने के लिए जगह बना लेंगे। हाथों को घुटनों पर रखेंगे (छायाचित्र-1)। शरीर का आकार वज्र-जैसा बनता है, इसलिए इसे वज्रासन कहते हैं।
यही एक ऐसा आसन है, जिसे खाना खाने के बाद भी किया जा सकता है- बल्कि सही मायने में, खाना खाने के बाद समय मिलने पर दो-चार मिनट के लिए इस मुद्रा में बैठना ही चाहिए।

पर्वतासन


वज्रासन में रहते हुए दोनों हाथों की उँगलियों को आपस में फँसाकर हम सर के ऊपर ले जायेंगे। हथेलियाँ ऊपर की ओर। दृष्टि भी ऊपर की ओर (छायाचित्र-2)।
हाथों को ऊपर ले जाते समय ही फेफड़ों में हम साँस भर लेंगे और इसे सौ गिनने तक रोकने की कोशिश करेंगे। अगर साँस रोकने की आदत नहीं है, तो कोई बात नहीं। सिर्फ तीस गिनने तक साँस रोकेंगे और साँस छोड़ते हुए हाथों को नीचे ले आयेंगे। इस प्रक्रिया को तीन बार दुहरा लेंगे।

शशांकासन



      शशांक यानि खरगोश। वज्रासन में बैठे-बैठे ही आगे झुककर सर को जमीन से सटा लेंगे। हाथों को पीठ पर रखेंगे (छायाचित्र-3)।

सुप्त वज्रासन


     वज्रासन में रहते हुए ही पीछे लेटना है। पीछे झुकते समय जरा-सा मुड़कर पहले एक केहुनी को जमीन से टिकायेंगे (छायाचित्र-4), फिर दूसरी केहुनी को।   
 
अन्त में सर को धीरे-से जमीन पर टिका लेंगे।
    अब हाथों को जाँघों पर रख सकते हैं (छायाचित्र-5)। सौ गिनने के बाद वापस वज्रासन में लौटते समय भी केहुनियों का सहारा लेंगे।


शशांकासन: दूसरा प्रकार


वज्रासन में घुटनों के ऊपर सीधे हो जायेंगे। धीरे-धीरे आगे झुककर सर को जमीन से सटा लेंगे। इस बार हाथ पैरों की एड़ियों पर रहेंगे (छायाचित्र-6)।
    शशांकासन हमारे चेहरे पर रक्त का संचरण बढ़ाता है- दोनों प्रकार के शशांकासन की मुद्रा में रहते समय हम इसे अनुभव कर सकते हैं।

उष्ट्रासन


      
उष्ट्र यानि ऊँट। शशांकासन (दूसरा प्रकार) से लौटकर सीधे होने के बाद हम पीछे झुकेंगे। पहले जरा-सा तिरछा होकर एक हाथ को एक एड़ी पर टिकायेंगे (छायाचित्र-7), फिर दूसरे हाथ को भी दूसरी एड़ी पर टिका लेंगे।
अब सर को पीछे लटकने देंगे (छायाचित्र-8)।
    आसन समाप्त होने पर बहुत धीरे-से एक-एक हाथ को एड़ियों से हटाकर सीधे होंगे।

पश्चिमोत्तानासन




        सामान्य ढंग से बैठकर दोनों पैरों को सामने फैला लेंगे- दोनों पैर आपस में सटे रहेंगे। पहले दोनों हाथों को आकाश की ओर खींचकर मेरूदण्ड को सीधा करेंगे और फिर आगे झुककर पैरों के दोनों अँगूठों को छूने की कोशिश करेंगे (छायाचित्र-9)। इस आसन में नाक को घुटनों के करीब ले जाने की हम कोशिश करते हैं; मगर घुटने ऊपर नहीं उठने चाहिए- इन्हें जमीन से चिपके रहना है।
    मेरा अपना सुझाव यह है कि हर तीस की गिनती के बाद थोड़ा-सा और आगे झुकने की कोशिश की जाय।

चक्रासन

यह एक कठिन आसन है- खासकर उनके लिए, जिन्होंने कसरत, योग वगैरह कभी नहीं किया है। अधिक उम्र वालों के लिए भी इसे साधना कठिन है। फिर भी, अगर इस आसन को शृँखला में शामिल किया जा रहा है, तो इसका कारण यह है कि मनुष्य का शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य काफी हद तक मेरूदण्ड की लोच पर निर्भर करता है। हमारी रीढ़ की हड्डी जितनी लचीली होगी, हमारा शरीर उतना ही स्वस्थ रहेगा और हमारा मन उतना ही प्रसन्न रहेगा। (बच्चे इतने चुस्त-दुरुस्त और प्रसन्न कैसे रह लेते हैं- इसके पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि उनकी मेरूदण्ड लचीली होती है!) खैर, अगर हममें से किसी ने योग पहले नहीं किया है, तो बेहतर है कि वे दो या तीन महीनों तक इसे नहीं करें, इसके बाद दो-तीन महीनों तक अर्द्धचक्रासन (छायाचित्र-11) करें- उसके बाद ही चक्रासन करने की कोशिश करें- वह भी बहुत सावधानी से।
    चक्रासन के लिए पहले पीठ के बल लेटकर पैरों को घुटनों से मोड़कर शरीर के निकट ले आयेंगे; हाथों को सर के दोनों तरफ रखेंगे- उँगलियों को शरीर की ओर रखते हुए (छायाचित्र-10)। 
 




अब हाथों और कन्धों पर शरीर का वजन डालते हुए कमर को हवा में उठा लेंगे- दरअसल, यही मुद्रा ‘अर्द्धचक्रासन’ है (छायाचित्र-11)।








अन्त में कन्धों को भी हवा में उठा लेंगे। शरीर का वजन हाथों और पैरों पर रहेगा और मेरुदण्ड अर्द्धचक्र बनायेगा (छायाचित्र-12)।
    लौटते समय पहले धीरे-से कन्धों को जमीन पर रखेंगे और फिर कमर को धीरे-से जमीन पर टिकायेंगे।

शवासन


शृँखला के मध्यान्तर के रुप में हम शवासन करेंगे। शव यानि मृत शरीर। पीठ के बल शान्त लेट जायेंगे- आँखें बन्द, हथेलियाँ ऊपर की ओर- और यह महसूस करेंगे कि हमारा शरीर बादलों के बीच तैर रहा है (छायाचित्र-13)। शवासन के दौरान हमारे शरीर में रक्त का वितरण एक समान हो जायेगा, इससे जब हम अगला आसन- सर्वांगासन- करेंगे, तब चेहरे पर रक्त का दवाब सामान्य रहेगा।
    आम तौर पर शवासन को योगाभ्यास के अन्त में किया जाता है- ‘सुस्ताने वाले’ आसन के रुप में, मगर दो कारणों से मैं इसे शृँखला के मध्य में शामिल कर रहा हूँ- 
1. चक्रासन-जैसे अपेक्षाकृत कठिन आसन को करने के बाद शरीर को आराम देने के लिए; 
2. अनुभव से मैंने यह पाया है कि सर्वांगासन करने से पहले शवासन कर लेने से (सर्वांगासन के दौरान) चेहरे पर रक्त का दवाब सामान्य रहता है- अन्यथा कभी-कभी यह दवाब ज्यादा महसूस होने लगता है।


सर्वांगासन


 जैसा कि नाम से ही जाहिर है, यह सभी अंगों का आसन है। जब कभी समय की कमी हो, सिर्फ इसी आसन को (तीन या पाँच मिनट के लिए) करना चाहिए। इसे आप ‘मास्टर’ आसन कह सकते हैं- यानि सभी आसनों की कुँजी!
    कहते हैं कि इस आसन के अभ्यास से ‘वलितम्-पलितम्-गलितम्’ (अर्थात् झुर्रियाँ पड़ना, बाल झड़ना, कोशिकाओं का क्षय- वार्धक्य के तीनों लक्षणों) को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
    दूसरी बात, हमारे रक्त में जो ऑक्सीजन घुला रहता है, उसके ज्यादातर अंश का इस्तेमाल हमारा मस्तिष्क करता है; जबकि हृदय से मस्तिष्क की ओर रक्त की पम्पिंग बाकी अंगों के मुकाबले कमजोर होती है। ऐसे में, मिनट भर के लिए भी मस्तिष्क को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन पहुँचाने का यह बढ़िया जरिया है।
    इसीलिए, यह भी कहा जाता है कि मानसिक एवं बौद्धिक श्रम करने वालों को इस आसन का अभ्यास जरुर करना चाहिए।
    तीसरी बात, पेट की आँतें भी मिनट भर के लिए दवाब से मुक्त हो जाती हैं।
    लेकिन कभी कसरत/योगाभ्यास जिन्होंने नहीं किया है, वे दो-तीन महीने इसका अभ्यास न करें, बाद में दो-तीन महीने ‘विपरीतकरणी मुद्रा’ (छायाचित्र-16) का अभ्यास करें और उसके बाद ही सर्वांगासन करें। मेरे ख्याल से, रक्तचाप की शिकायत वालों को इस आसन से बचना चाहिए।
      खैर। सर्वांगासन एक झटके में न कर हम पाँच चरणों में करेंगे।
    1. पहला चरण शवासन है, जो हमने कर लिया।



2. दूसरे चरण में दोनों पैरों को जमीन से थोड़ा-सा (15-20 डिग्री) ऊपर उठायेंगे और 30 गिनने तक रुकेंगे (छायाचित्र-14)।

 

3. तीसरे चरण में पैरों को थोड़ा और ऊपर (90 डिग्री से कुछ कम) ले जायेंगे और वहाँ भी 30 गिनने तक रुकेंगे (छायाचित्र-15)।


 4. चौथे चरण में कमर को हाथों का सहारा देते हुए पैरों को सर के आगे ले जायेंगे- चित्र से बेहतर समझ में आयेगा (छायाचित्र-16)। यही मुद्रा ‘विपरीतकरणी मुद्रा’ है। यहाँ भी 30 गिनने तक रुकेंगे। 
     


5. अब पाँचवे और अन्तिम चरण में पैरों को सीधा आकाश की ओर कर लेंगे- कमर सीधी, शरीर का वजन कन्धों तथा सर के पिछले हिस्से पर। दृष्टि घुटनों पर। कमर को हाथों का सहारा जारी रहेगा (छायाचित्र-17)।
      आसन से लौटते समय पहले विपरीतकरणी मुद्रा में आयेंगे, फिर तीसरे और दूसरे चरण में, और फिर अन्त में पैरों को धीरे-से जमीन पर रखकर कुछ सेकेण्ड सुस्तायेंगे।

मत्स्यासन


मत्स्य यानि मछली। अब हम जो भी योगाभ्यास करेंगे, उसके लिए ‘पद्मासन’ जरूरी है। यहाँ यह मान लिया जा रहा है कि भारतीय होने के नाते आप जानते हैं कि पद्मासन में कैसे बैठते हैं। अभ्यास नहीं है, तो धीरे-धीरे अभ्यास करना पड़ेगा।
खैर, पद्मासन में बैठने के बाद हम धीरे-धीरे पीछे की ओर लेटेंगे। लेटते समय जरा-सा तिरछा होकर पहले एक केहुनी को जमीन पर टिकायेंगे (छायाचित्र-18), फिर दूसरी केहुनी को और फिर, सर को जमीन से टिका लेंगे।

      सर टिक जाने के बाद हाथों को जाँघों पर रख सकते हैं (छायाचित्र-19)। आसन से लौटते समय भी केहुनियों का सहारा लेंगे।
    सर्वांगासन में गर्दन की जो स्थिति बनती है, उसकी उल्टी स्थिति इस आसन में बनती है, इसलिए मत्स्यासन को सर्वांगासन के बाद किया जाता है।

प्रणामासन


इसमें पद्मासन में बैठे-बैठे आगे की ओर झुकना है। हथेलियों को प्रणाम की स्थिति में लाकर जमीन पर रखकर धीरे-धीरे आगे की ओर खिसकाते जायेंगे- जब तक कि सर जमीन से न सट जाय (छायाचित्र-20)।
     

तुलासन


तुला माने तराजू। पद्मासन में रहते हुए दोनों हाथों को दोनों तरफ जमीन पर रखेंगे और फिर हाथों पर शरीर का वजन डालते हुए शरीर को हवा में उठा लेंगे (छायाचित्र-21)।
    शुरु-शुरु में 30-30 (या सुविधानुसार इससे कम) की गिनती के साथ इसे तीन (या इससे अधिक) बार करेंगे, बाद में सध जाने पर सौ गिनने तक इस मुद्रा में रह सकते हैं।


प्राणायाम

यह एक जाहिर-सी बात है कि हम आम तौर पर जिस तरीके से साँस लेते हैं, उससे फेफड़ों के पूरे आयतन में हवा नहीं भरती। हाँ, दौड़ने/जॉगिंग या कसरत करने के क्रम में फेफड़ों में पूरी हवा भरती है। फिर भी, इस प्राणायाम का अपना अलग महत्व है, क्योंकि इसमें साँस गहरी होती है।
पद्मासन में बैठकर तर्जनी और मध्यमा उँगलियों को भ्रुमध्य (दोनों भौंहों के बीच) पर रखेंगे। अगर यह हाथ दाहिना है, तो अँगूठा दाहिनी नासिका की ओर तथा अनामिका (उँगली) बाँयी नासिका की ओर रहेगी।
    पहले अँगूठे से दाहिनी नासिका को बन्द कर (छायाचित्र-22) बाँयी नासिका से गहरी साँस लेंगे और इसके बाद अनामिका से बाँयी नासिका को बन्द कर (छायाचित्र-23) दाहिनी नासिका से अँगूठे को हटाकर साँस बाहर निकाल देंगे।


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अगली बार दाहिनी नासिका से गहरी साँस लेकर बाँयी नासिका से साँस निकालेंगे।
    यह क्रम चलता रहेगा। साँस लेते समय फेफड़ों को फुलाने की कोशिश करेंगे और साँस छोड़ते समय पेट को थोड़ा-सा पिचका लेंगे। इस प्राणायाम के लिए (इस शृँखला में) कुल चार मिनट का समय निर्धारित है- मगर घड़ी देखने के बजाय हम गिनकर 12 बार गहरी साँस भरेंगे और छोड़ेंगे।
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एक दूसरा तरीका

    प्राणायाम का एक दूसरा तरीका तरीका भी बता दूँ- इसमें श्वास-प्रश्वास के साथ ‘कुम्भक’ (साँस को अन्दर रोकना) व ‘रेचक’ (साँस को बाहर रोकना) भी शामिल है।
    पद्मासन में बैठकर छह गिनने तक साँस अन्दर भरेंगे, फिर छह गिनने तक इसे अन्दर ही रोकेंगे, फिर छह गिनते हुए साँस को बाहर निकालेंगे और अन्त में, छह गिनने तक साँस को बाहर ही रोककर रखेंगे। इस चारों प्रक्रिया को कुल बारह बार दुहरा लेंगे। छह गिनने में अगर हम छह सेकण्ड ही लगायें, तो यह पूरी प्रक्रिया पाँच मिनट में पूरी हो जायेगी।

ध्यान / उपसंहार


पद्मासन में ही मेरूदण्ड बिलकुल सीधा कर हम बैठेंगे। दोनों हाथ घुटनों पर- हथेलियाँ ऊपर की ओर। अगर हम तर्जनी उँगलियों को अँगूठों की जड़ पर रखते हुए मध्यमा को जमीन से सटा लें, तो यह ‘ज्ञानमुद्रा’ बन जायेगी (छायाचित्र-24)।
    आँखें बन्द कर हम यह कल्पना करेंगे कि हमारे शरीर की सारी ऊर्जा घनीभूत होकर मेरूदण्ड की निचली छोर पर जमा हो रही है। इस स्थिति में लगभग 10 तक गिनेंगे। इसके बाद अनुभव करेंगे कि घनीभूत ऊर्जा की वह गेन्द नाभि पर आ गयी है। यहाँ भी दस की गिनती तक रुकेंगे। इसके बाद ऊर्जा-पुँज हृदय में, फिर गले में और फिर भ्रुमध्य (दोनों भौंहों के बीच) में आकर रुकेगी। बेशक, तीनों जगह दस-दस तक गिनेंगे। अन्त में, हम यह अनुभव करेंगे कि यह ऊर्जा हमारे माथे के ऊपर से निकल कर अनन्त ब्रह्माण्ड से मिल रही है।
    इस प्रकार, ध्यान की यह प्रक्रिया एक मिनट की है। (आज के जमाने के हिसाब से यही बहुत है!) सिर्फ इतना ध्यान रखना है कि ध्यान बीच में न टूटे- अर्थात् ऊर्जा-पुँज (काल्पनिक ही सही) शरीर के बीच में ही कहीं छूट न जाये। दूसरे शब्दों में, ‘मूलाधार चक्र’ से शुरु हुई ऊर्जा की इस यात्रा को ‘सहस्स्रार चक्र’ से बाहर भेजकर पूर्ण करना ही है।
    आशा की जानी चाहिए कि ध्यान हमारी मानसिक क्षमताओं को बढ़ायेगा।
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उपसंहार

    मेरा यह मानना है कि स्वस्थ रहने के लिए सिर्फ योगाभ्यास पर्याप्त नहीं है, बल्कि कसरत भी जरुरी है- खासकर, किशोरों एवं युवाओं के लिए।
    कसरत आम तौर पर शाम को ही किया जाता है। कसरत कम-से-कम 40 मिनटों की तो होनी ही चाहिए। मैं इस समय को दो भागों में बाँटता हूँ- 20 मिनटों की ‘वार्मिंग-अप’ और 20 मिनटों की ही ‘फ्री-हैण्ड एक्सरसाइज’। वार्मिंग-अप का सबसे बढ़िया तरीका है- ‘जॉगिंग’, यानि धीमी दौड़। इसकी सुविधा न रहने पर घर में ही ‘रस्सी-कूद’ की जा सकती है। रस्सी-कूद न आने पर एक ही स्थान पर खड़े होकर दौड़ने, यानि ‘स्किपिंग’ का अभ्यास किया जा सकता है। (पक्के फर्श पर स्किपिंग के दौरान रबर सोल के जूते होने चाहिए, नहीं तो, दो-चार ‘फुट-मैट’ को एक साथ पैरों के नीचे रख लेना चाहिए।)
    फ्री-हैण्ड एक्सरसाइज बहुत तरह के होते हैं, उनमें से कुछ का चयन अभ्यास के लिए किया जा सकता है। ध्यान इस बात का रखना है कि कुछ जाँघों की मांसपेशियों के लिए हों, कुछ कमर के लिए, कुछ बाजुओं की मांसपेशियों के लिए और कुछ पेट व पीठ की मांसपेशियों के लिए हों। पेट व पीठ वाले कसरत बैठकर किये जाने वाले हों। इसी क्रम में इन कसरतों का अभ्यास करना चाहिए- पहले जाँघों के लिए, फिर कमर के लिए, फिर बाजुओं के लिए और फिर पेट व पीठ के लिए। चारों प्रकार की मांसपेशियों के लिए अगर चार-चार कसरत चुने जायें, तो कुल 16 कसरतों की जरुरत पड़ेगी। एक कसरत को आठ बार दुहराया जा सकता है।
    अभ्यास के अन्त में ‘रिलैक्सेशन’ के लिए कुछ हल्के कसरत भी किये जाते हैं। ‘वार्मिंग-अप’ अगर कसरत की भूमिका, प्राक्कथन या प्रस्तावना होती है, तो ‘रिलैक्सेशन’ इसका उपसंहार या पश्चकथन।
    मैंने स्वयं कसरत की जो शृँखला तैयार की है, उसे ई’बुक के माध्यम से प्रस्तुत करना सम्भव नहीं जान पड़ता- कभी मौका मिला, तो किसी और माध्यम से इसे प्रस्तुत करने की कोशिश करुँगा।
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    व्यक्तिगत रुप से मेरा यह मानना है कि सप्ताह के सातों दिन और साल के बारहों महीने योगाभ्यास और/या कसरत करना जरुरी नहीं है। सप्ताह में तीन-चार दिन और साल में तीन-चार महीने छूट भी जायें, तो कोई बात नहीं। मेरी यह धारणा गलत भी हो सकती है, मगर मैं अपने अनुभव से ऐसा कह रहा हूँ।
    योगाभ्यास के स्थान पर किसी-किसी दिन ‘सूर्य नमस्कार’ करना और कसरत के स्थान पर किसी-किसी दिन फुटबॉल, बास्केटबॉल, बैडमिण्टन, या कबड्डी, खो-खो, गद्दी-जैसा कोई खेल खेलना, या तैराकी का अभ्यास अच्छा रहता है।
    अपना कर्तव्य समझ कर मैंने अपनी बातें सामने रख दी है... अब यह देश की किशोर एवं युवा पीढ़ी पर निर्भर करता है कि वह या तो इन बातों पर हँसे, या इन्हें गम्भीरता से ले।
    इति।

                                                                                              -जयदीप शेखर